Mahalaxmi Vrat Katha: घर में नहीं आएगी दरिद्रता! महालक्ष्मी व्रत में पढ़ें ये कथा, शिव जी ने बताया महत्व


Mahalaxmi Vrat 2025: आज 31 अगस्त से महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत हो चुकी है. धन, धान्य, सुख, समृद्धि की प्राप्ति के लिए ये 16 दिन के व्रत बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं. महालक्ष्मी व्रत में कथा का बहुत महत्व है, अगर आप 16 दिन व्रत न कर पाएं तो इन दिनों कथा का श्रवण जरुर करें, इससे पुण्य फल प्राप्त होता है.

महालक्ष्मी व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीनकाल में मंगलार्ण नाम का एक शूरवीर चक्रवर्ती सम्राट शासन करता था. उसकी पत्नी थी पद्मावती. उनका एक सेवक था तवल्लक. एक दिन राजा आखेट करने वन में गए जहां घूमते घूमते उन्हें जल की आवश्यकता हुई, तमाम सैनिकों सहित तवल्लक भी तत्परता से वन में जल खोज रहा था. वह वन में एक सुंदर सरोवर के पास पहुंचा जहां कुछ देव कन्याएं महालक्ष्मी व्रत कर रही थीं.

उन सभी को इस प्रकार पूजन करते देख तवल्लक ने उनसे प्रश्न किया – ‘हे देवियों! यह आप क्या कर रही हैं? कृपया वर्णन करने की कृपा करें।’ देव कन्याओं ने कहा महालक्ष्मी व्रत कर रही हैं, यह व्रत सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला पुण्यशाली व्रत है’ इस व्रत की महत्ता ज्ञात करने के उपरान्त तवल्लक ने भी महालक्ष्मी व्रत ग्रहण कर लिया, जल लेकर वो राजा के पास पहुंचा.

तवल्लक के हाथ में सूत्र (डोरा) बंधा देखकर उससे पूछा – ‘हे द्विजवर! आपके हाथ में यह सूत्र कैसा है, क्या आपने किसी व्रत का पालन किया है?’ तवल्लक ने राजा को महालक्ष्मी व्रत की महीमा बताई जिसके बाद राजा ने भी व्रत ग्रहण कर सूत्र बांधा.

राजा के हाथ में बँधें सूत्र को देखकर उनकी पत्नी कुपित होकर बोली – ‘किस स्त्री ने आपके हाथ में यह सूत्र बाँधा है? कौन है वो स्त्री, जिसने आपको ठग लिया है?’ रानी के क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर राजा दुखी हुए उन्होंने कहा – ये महालक्ष्मी के श्रेष्ठ व्रत का सूत्र है, समझाने पर भी रानी का क्रोध शान्त नहीं हुआ उसने उनके हाथ से वह सूत्र तोड़कर भीषण अग्नि में डाल दिया.

रानी की इस मूर्खता से राजा बेहद आहत हुए और वन ले जाकर उसका त्याग कर दिया.  महालक्ष्मी का अपमान करने के परिणामस्वरूप रानी वन में किसी आश्रयस्थल की खोज में वह इधर से उधर भटक रही थी. आश्रम के निकट ही उसे ऋषि वसिष्ठ का दर्शन हुआ. ऋषिवर को ज्ञात हो गया कि देवी महालक्ष्मी का अनादर करने के कारण ही रानी की यह दुर्दशा हुयी है. अतः ऋषिवर ने रानी से वही महालक्ष्मी व्रत करवाया. व्रत के प्रभाव से रानी का चित्त निर्मल एवं शान्त हो गया.

एक दिन राजा पुन: वन में आखेट करने गए जहां वह राजा की दृष्टि वसिष्ठ जी के आश्रम के बाहर विचरती अत्यंत सुन्दर, मृगनयनी स्त्री पर पड़ी.राजा उस पर मोहित हो गए और स्त्री से विवाह की इच्छा जताई. तब वह सुन्दरी बोली – ‘हे राजन्! मैं तुम्हारी अर्धाङ्गिनी ही हूँ. मैंने महालक्ष्मी व्रत किया जिसके पुण्य प्रभाव से ही ये रूप-सौन्दर्य एवं कान्ति प्राप्त हुआ है.

रानी के व्यवहार में आए बदलाव के बादा राजा अपनी अर्धाङ्गिनी पद्मावती सहित नगर में लौट आया. फिर सम्पूर्ण प्रजा ने भी राजा के साथ महालक्ष्मी व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन किया श्री महालक्ष्मी व्रत के प्रभाव से राजा ने भूलोक पर नाना प्रकार के सुखों को भोगा तथा उसे अनेकों पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति हुयी. तवल्लक ब्राह्मण उसका प्रधानमन्त्री बन गया

भगवान शिव कहते हैं – “हे स्कन्द! इस श्रेष्ठ महालक्ष्मी व्रत को सोलह वर्षों तक करना चाहिये. जो भी स्त्री या पुरुष सावधानीपूर्वक इस व्रत को करेगा उसकी कामनाओं की पूर्ति हेतु स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश भी सदैव तत्पर रहेंगे. जो भी भक्त एकाग्रचित्त होकर इस व्रत कथा का पाठ एवं श्रवण करता है, अलक्ष्मी कभी उसके जीवन में प्रवेश नहीं करती.

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